
Talking Mirror
सुनयना जी, माँ से यह कहना कि ऑफिस की तरफ से घूमने जा रही हूँ, वाला हिस्सा ठहरकर देखने लायक है। बाकी हर जगह आपने अनुमति लेनी छोड़ दी है, सिर्फ यहीं झिझक बची रह गई है। जहाँ खुद पर भरोसा पूरा है वहाँ सच बोलने में दिक्कत नहीं होती, दिक्कत वहीं आती है जहाँ अंदर अब भी थोड़ा हिसाब देना बाकी लगता है। तो यह जो हिम्मत दौड़ने, तैरने, ट्रैकिंग में दिख रही है, वही हिम्मत अभी माँ के सामने सीधा सच कहने में पूरी नहीं पहुँची है। दौड़ 10 किलोमीटर की है, पर असली द…















