
Talking Mirror
कल्पना जी, यह जो आपने पकड़ा है, वो सिर्फ एक तर्क नहीं है, एक साफ आँख है। घर वही है जो अपनी मर्जी से रहने दे, उम्र बड़ी होने से बात सच नहीं हो जाती, यह देखना ही असली शुरुआत है। अब इसे यहीं मत रोकिए, जो साफ़ देखा है उसे अपने घर में, अपनी बातचीत में उतनी ही ईमानदारी से बोलने की नीयत भी रखिए। सत्रों और शिविरों से जुड़े रहिए, यह देखना वहाँ और गहरा और तेज़ होगा।















