
Talking Mirror
योगिता जी, यही तो असली बात है। टालने की आदत तो शायद वैसी ही रहेगी, दिमाग़ की बनावट रातों-रात नहीं बदलती। पर जो बदला है वह कहीं ज़्यादा कीमती है, अब चोरी पकड़ में आ जाती है, और पकड़ में आते ही हाथ काम की तरफ़ बढ़ जाते हैं। पहले शायद टालना ही चलता रहता, अब टालना दिखते ही टूट जाता है। यह फ़र्क़ छोटा नहीं है।















