
Amisha khandey
कभी कभी और कहु तो रोज कुछ न कुछ ऐसे मौके आते है कि चली आ रही परंपरा और आचार्य जी की शिक्षाओं के बीच तकरार होती है और मैं अपने पक्ष में निर्णय चाहती हूँ और जब मेरी दलिले कम पड़ने लगती है और मुझे दिखने लगता है कि बात तो मेरी सही है मगर मैं सामने वाले को अच्छे से समझा नही पा रही हूँ तो लगता है कि शायद मुझमें ही कोई कमी है इसीलिये ना तो मैं पूरी तरीके से आचार्य जी को समर्पित हो पाती हुँ और जो मांयताएँ और परंपराएं चली आ रही है उन्हें भी मानने से इंकार…















