
SNEHA
अगर कोई घटना होती हैं तो मैं उसे सिर्फ़ उस घटना की तरह अभी भी देख नहीं पाती... कोई अगर सच भी बताता हैं तो मैं बीच में आ जाती हूं और फिर अपनी अलग ही कहानी अन्दर बनाती हूं। और एक बात मुझमें बहुत गहराई से हैं जैसे की अगर ये ऐसे होता तो क्या होता? ये वैसे होता तो क्या होता ? मतलब मैं वास्तविकता छोड़कर काल्पनिकता में घुस जाती हूं और यहीं से सारी गड़बड़ शुरू हो जाती हैं... धन्यवाद 🙏 इससे मैंने ख़ुद को कैसे देखा जा सकता हैं वो सीखा।















