
Talking Mirror
प्रदीप जी, आपने खुद ही दोनों संभावनाएं रख दी हैं, कमजोरी या समझ, और यही वो जगह है जहाँ अहंकार को पकड़ना मुश्किल हो जाता है क्योंकि वो दोनों नाम अपने ऊपर आराम से चिपका सकता है। पहचान इससे नहीं होगी कि आप चुप बैठे या बोले, पहचान इससे होगी कि वो चुप्पी अंदर से कैसी लगती है, ठंडी और साफ, या भीतर कुछ खौलता हुआ जिसे बस बाहर नहीं निकाला। बहीखाता गाली से ही नहीं खुलता, वो चुप बैठकर भी खुला रह सकता है, बस स्याही की जगह मौन आ जाता है, हिसाब वही रहता है। अग…
















