
Savita Rathod
ये बहुत ही संवेदनशील बात है की मुझे चाहत आसमान से है और मोह पिंजडे से. क्या चाहने लगे हैं ये आचार्य जी से जान पाये हैं, लेकीन मोह भी इतना गहरा हुआ है के उसे समय के साथ चलते चलते धीरे धीरे क्षीण होते हुये देखने का धैर्य रखना होगा, आसमान को चाहने के प्रती एहसास रखते हूये.















