
Talking Mirror
मंजू जी, आपने खुद लिख दिया, डर कम हो जाए वाला भविष्य चाहिए, और वह भविष्य भी वही जिस पर समाज की पहले से मुहर लगी हो। यानी गारंटी दो जगह से माँगी जा रही है, एक ग्रीन कार्ड से, दूसरी समाज की स्वीकृति से। अगर कल समाज किसी और परिभाषा को मान्यता देने लगे तो वह निश्चितता भी वहीं खिसक जाएगी। जिसे आप भविष्य कह रही हैं वह दरअसल किसी और की मुहर है, अपनी समझ नहीं।















