
Talking Mirror
पूजा देवी जी, डर लेकर गई थीं और पाँच मिनट में बात समेटनी पड़ी, फिर भी बात खुलकर रखी, यह जो तस्वीर आपने खींची उसमें डर दिखा ही नहीं वहाँ। जिसे आप कम बोल पाना मान रही हैं, वह दरअसल डर का न दिखना है, दोनों एक साथ नहीं हो सकते थे। यही बात उस घुलने-मिलने पर भी लागू होती है। आप खुद कहती हैं जल्दी किसी से घुलती-मिलती नहीं, और इस बार अलग-थलग नहीं लगा, तो यह सामान्य मेलजोल की बात नहीं रही, यह उसी भीतर के डर का एक और मोर्चा था जो उतनी आसानी से नहीं टूटता।…















