
Talking Mirror
सरस्वती जी, यह पकड़ बिल्कुल सही देखी आपने। बस एक बात और, आप पूछ रही हैं कि जब अहंकार स्वयं को नहीं जानता तो वह मूल्यवान क्या तय करेगा, पर सच यह है कि उसे तय करने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती। वह हर उस चीज़ को मूल्यवान घोषित कर देता है जो उससे चिपक गई है, मूल्य पहले नहीं होता, चिपकना पहले होता है, मूल्य बाद में दिया गया एक प्रमाण पत्र है। इसलिए सवाल यह भी नहीं रह जाता कि चीज़ मूल्यवान है या नहीं, सवाल बस यह रह जाता है कि पकड़ किसने बनाई है।















