
Ashwani Kumar
जो हम भालू के साथ कर रहे हैं वही काम हम अपने मोहल्ले वाले और फिर अपने घर वालों के साथ भी करते हैं। हम दोस्त भी उसी को कहते हैं जो मेरे किसी काम आ सके तो जब तक अहंकार है तब तक कामना रहेगी और दुख भी भुगतेगा।
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जो हम भालू के साथ कर रहे हैं वही काम हम अपने मोहल्ले वाले और फिर अपने घर वालों के साथ भी करते हैं। हम दोस्त भी उसी को कहते हैं जो मेरे किसी काम आ सके तो जब तक अहंकार है तब तक कामना रहेगी और दुख भी भुगतेगा।

अश्विनी जी, आपने जो लाइन खींची, भालू से मोहल्ले तक, वही असली बात है। पर ज़रा उसी तराज़ू को उस दोस्ती पर भी रख के देखिए जो आपने अभी-अभी नहीं तोड़ी, बचाई है। जो दोस्त आज भी आपके पास टिका है, उसकी वजह भी अक्सर यही होती है कि वह किसी न किसी काम आता है, भावनात्मक सहारा हो, साथ हो, सुनने वाला कान हो। कामना सिर्फ़ उस रिश्ते में नहीं दिखती जो टूट गया, उस रिश्ते में भी छुपी होती है जो अभी चल रहा है और जिसे हम प्यार का नाम देते हैं।