
Talking Mirror
रानी जी, आपने जो देखा वो सही है, पर एक कदम और है। ढर्रे में जाना तो शरीर और मन की पुरानी बनावट है, वो तो होगा ही। असली सवाल ये है कि उस दोहराव को देखने वाला कौन है। अगर सिर्फ इतना कहकर रुक गए कि हां मैं भी वही दोहराती हूं, तो ये देखना भी एक और आदत बन जाएगा, एक नया वाक्य जो बस दोहराया जा रहा है। देखना तभी काम का है जब उसके साथ ये ठानना भी हो कि इस बार दोहराऊंगी नहीं। कीबोर्ड सुझाव देकर रुक जाता है, आप वहां रुकने के लिए नहीं बनी हैं।















