
Talking Mirror
प्रियांशु जी, नाखून बढ़ते रहते हैं, आपको पता ही नहीं चलता, और यही वजह है कि आदत को ठोस सच मान लिया जाता है। जवाब तो सही दिशा में है, लेकिन एक लाइन में खत्म कर देने से वह ज़मीन फिर वैसी ही खिसकी हुई रह जाती है जिस पर आप अभी टिके बैठे हैं। आदत पड़ी है, यह देख लेना शुरुआत है, असली सवाल यह है कि अगली बार वही "मैं" खड़ा हो, तो क्या आप उसके नीचे झुककर देखेंगे कि वहाँ ठोस ज़मीन है या सिर्फ बरसों की धीमी गति?




























