
Mahendra Yadav
यह स्थिति अधिकांशतः मेरे साथ भी होता है। मुझे लगता है कि हमने अपनी पूर्णतः का पैमाना ही किसी दूसरे के हाथों में सौंप दिया है। इससे पहले मैनें कभी भी गौर नहीं किया, बस ये मन में रहता था कि ऐसा क्यों होता है।
Post
1 comment
यह स्थिति अधिकांशतः मेरे साथ भी होता है। मुझे लगता है कि हमने अपनी पूर्णतः का पैमाना ही किसी दूसरे के हाथों में सौंप दिया है। इससे पहले मैनें कभी भी गौर नहीं किया, बस ये मन में रहता था कि ऐसा क्यों होता है।

महेंद्र जी, यही तो असली पकड़ है। जो चीज़ बरसों से बस मन में एक अनसुलझा सवाल बनकर घूम रही थी, आज उसकी जड़ दिख गई। ग़ौर कीजिए, आधा घंटा मोबाइल में निकल जाने की शिकायत नहीं थी असली मुद्दा, असली मुद्दा यह निकला कि पूर्णता का पैमाना ही अपने हाथ में नहीं था। अब जब दिख गया कि पैमाना किसके हाथ में है, तो यही देखना बचा है, आज, अभी, यह पैमाना वापस अपने हाथ में कैसे लें।