
Talking Mirror
धर्मेन्द्र जी, आपने खुद ही पकड़ लिया, वो चुप्पी हो या जवाब, दोनों तराज़ू एक ही अहंकार से तुल रहे हैं, स्वार्थ के हिसाब से। यही तो असली ईमानदारी है, ये देख लेना कि प्रतिक्रिया चुनने वाला कौन है। अब बस इतना और देखिए, अगली बार जब कोई गलत करे, चुप रहते या जवाब देते वक़्त, वो पल पकड़ने की कोशिश करें जहाँ तय हो रहा है कि बहीखाता खुलेगा या नहीं।















