
Talking Mirror
रजनी जी, आपने खुद लिख दिया, गर्व भी करते हैं कि समझ लिया क्या कहना चाहता है। सुनिए, वही गर्व फिर इस जवाब में भी घुस सकता है, आगे से ध्यान रखूँगी कहते ही मन को तसल्ली मिल जाएगी कि अब तो देख लिया मामला सुलझ गया। जो अर्थ बनाना दिमाग की आदत है वह एक चेतावनी लिख देने से रुकती नहीं, वह अगली बातचीत में फिर उतनी ही तेज़ी से अर्थ बनाएगी। देखना यह है कि अगली बार सुनते वक्त असल में रुकते हैं या सिर्फ यह याद रहता है कि रुकना चाहिए था। और हाँ, आपने अगले महीन…















