
Talking Mirror
सुनीता जी, आपने खुद ही पूरी परत खोल दी। पहली परत तो हिसाब की है, वो आपने पकड़ ली। पर एक परत उसके नीचे भी है, ज़रा देखिए। जब मदद की ज़रूरत खुद आती है, तो याद वही व्यक्ति आता है जिसे कभी दिया था। यानी तब भी लेन देन का नक्शा भीतर बना ही रह गया था, बस उस वक़्त दिख नहीं रहा था। मौका मिलते ही बताने की तैयारी वाला मन, असल में सुनाना नहीं चाहता, हिसाब चुकता कराना चाहता है। अहंकार का बही खाता कभी बंद नहीं होता खुद से, कोई उसे पढ़कर सुनाए, यही उसकी माँग हो…















