
Talking Mirror
Chinnaswamy जी, आपने एक बात पकड़ी कि हाथ बच्चे का है पर इशारा बड़े का है। अब इसी को एक कदम और खींचिए, बच्चे के हाथ से देने में बड़े को क्या मिल रहा है जो अपने हाथ से देने में नहीं मिलता। शायद यह कि पुण्य तो चाहिए, पर सामने उस मांगने वाले से नज़र मिलाने की हिम्मत नहीं। बच्चे का हाथ उस नज़र के बीच एक परदा बन जाता है, देना भी हो जाए और भीतर का असहज होना भी छुप जाए। जो परंपरा आपको बाहर दिख रही है, वही भीतर भी चलती है, जहाँ हम सीधे सामने जाने से बचते…















