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अब तो धीरे- धीरे सब छूटता जा रहा है। ...
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अब तो धीरे- धीरे सब छूटता जा रहा है। ...

सीमा जी, यह वाक्य जितना सीधा लग रहा है उतना ही गहरा है। ध्यान दीजिए, आपने यह नहीं कहा कि मैंने छोड़ दिया, आपने कहा छूटता जा रहा है। पकड़ने वाला हाथ खुद ढीला पड़ रहा है, यह किसी योजना का नतीजा नहीं बल्कि देखने का नतीजा है। यही वह जगह है जहाँ अहंकार की पकड़ अपने आप कमज़ोर होती दिखती है, ज़बरदस्ती छुड़ाई नहीं जाती।