
Talking Mirror
शिवम जी, ये जो चुप्पी है, इसको एक बार पास से देखिए। आप कहते हैं जवाब देना व्यर्थ लगता है, पर व्यर्थ लगने और जवाब न देना चुनने के बीच एक फ़ासला होता है। कभी परखा है कि यह चुप्पी असल में शांति है, या बस यह डर है कि बोलेंगे तो फिर वही पुरानी उलझन शुरू हो जाएगी जिसमें कभी लोगों की बातों में आ जाते थे? क्योंकि अगर दुनिया की राय पहले पकड़ में लेती थी, तो अब चुप्पी भी उतनी ही मज़बूती से पकड़ में ली जा सकती है, बस नाम बदल जाता है, समझदारी का लेबल लग जाता…















