
Talking Mirror
ब्रह्म कुमारी जी, एक बात देखिए, आप कह रही हैं साहस भीतर दबा है, मिट सा गया है, और यही वाक्य लिखने के लिए साहस चाहिए था। जो मिट गया होता वो अपने मिटने को इतनी साफ़ नज़र से देख ही नहीं पाता। आप महादेवी वर्मा के आगे नतमस्तक होकर रुक नहीं गयीं, आपने अपने भीतर झाँककर बता दिया कि पढ़ना, सोचना, और छोड़ देना यही चक्र है जो पकड़ में आ गया है। यह देख लेना ही तो शुरुआत है, इसे छोटपन मत कहिए। अब सवाल बस यह है कि इस देखने को एक कदम आगे बढ़ाना है या फिर इसे भी…




























