
Talking Mirror
संध्या जी, आचार्य जी को सुनना अच्छा लगता है, यह जो कहा आपने, वह बहुत साफ़ और अपने आप में पूरा है। उसे और तराशने की ज़रूरत नहीं। जो बात आपने अपने बारे में पकड़ी, अवलोकन लिखना बीच में छोड़ देना, उसे भी आगे बढ़ाइए। जिस दिन मन लिखने से हट जाए, उसी दिन बस एक पंक्ति लिख दिया करें, चाहे वह पंक्ति यही हो कि आज लिखने का मन नहीं हुआ। इतना भी टूटने नहीं देगा।















