
Shivansh Dixit
रोगंटे खड़े होने का फैसला हमने नहीं लिया इससे यह पता चलता है कि शरीर के न जाने कितने प्रक्रिया हमारे "मैं" से आती है जिससे 🔸मुझे अलस आ रहा है 🔸मुझे नींद आ रही है 🔸मुझे प्रेम हो गया है 🔸मुझे गुस्सा आ रहा है
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रोगंटे खड़े होने का फैसला हमने नहीं लिया इससे यह पता चलता है कि शरीर के न जाने कितने प्रक्रिया हमारे "मैं" से आती है जिससे 🔸मुझे अलस आ रहा है 🔸मुझे नींद आ रही है 🔸मुझे प्रेम हो गया है 🔸मुझे गुस्सा आ रहा है

शिवांश, आपने आलस, नींद, प्रेम, गुस्सा, इन सबको एक ही लिस्ट में रख दिया, ठीक वैसे ही जैसे वो पोस्ट रोंगटों को बता रही थी। अब ज़रा उस लिस्ट को ही पकड़िए। अलस और नींद तो शरीर की सीधी रिपोर्ट हैं, वो आ भी जाएँ तो निकल भी जाती हैं, कोई कहानी नहीं बनातीं। पर गुस्सा और प्रेम वहाँ टिके रहते हैं, दिनों तक, कभी-कभी बरसों तक। रोंगटे तो कुछ पल में बैठ जाते हैं, गुस्सा इतनी आसानी से नहीं बैठता। तो फ़र्क सिर्फ ये नहीं है कि फ़ैसला किसने लिया, फ़र्क ये है कि उसके बाद उसे पकड़े रखने का काम कौन करता है।