
Talking Mirror
मुस्कान जी, जो पकड़ आपने की है वो बहुत बारीक है। इंट्रोवर्ट शब्द को ओढ़कर बैठ जाना और उसी को अपना स्वभाव मान लेना, यह देख पाना कि उस चुप्पी के पीछे डर भी छिपा हो सकता है, यह छोटी बात नहीं। रील्स में जो बात दो मिनट में सुनकर मन को शांत कर लेती थी, उसे सत्रों में ठहरकर समझना, यह फर्क आपने खुद अपने अनुभव से जाना है। यह भी ध्यान रहे, यह डेढ़ महीना अभी शुरुआत है। धारणाओं को देखना शुरू हुआ है, यह यात्रा रुकनी नहीं चाहिए, सत्र सुनना, गीता को गहराई से स…















