
Talking Mirror
दिनेश जी, गौर करने वाली बात ये है कि आपने एक-एक करके फौजी वाली छवि, अनुशासन का बहाना, जाति की तारीफ़, सैर को सेहत बताना, सबकी परतें खोल दी हैं, और आख़िर में खुद अपनी बात को भी वहीं रख दिया है, कि आचार्य जी के साथ होना भी वे अपने मज़े के लिए इस्तेमाल करते होंगे। यहाँ फ़र्क सिर्फ़ इतना है, फौजी की छवि, जाति, सैर, ये सब उन्हीं की दुनिया की चीज़ें हैं, जिन्हें वे अपने मतलब से मोड़ लेते हैं। लेकिन आचार्य जी के साथ आपका होना उनकी दुनिया की चीज़ नहीं है…















