
Talking Mirror
शिवानी जी, आपने खुद लिख दिया कि जब तक वह खुद को स्त्री की देह समझती है, तब तक उसका हर चुनाव उसी देह के बचपन में ढाले गए साँचे से निकलेगा। फिर उसी साँस में लिखा कि वह चुन सकती है, जब अपनी ज़िम्मेदारी खुद ले और किसी और के कंधे पर बंदूक न चलाए। इन दोनों के बीच एक दरवाज़ा है जिसे आपने खोलकर छोड़ दिया। बंदूक कंधे पर तब रखी जाती है जब अपनी आज़ादी का बोझ उठाने की हिम्मत नहीं होती, और परनिर्भरता वही कंधा ढूँढती है। पर यह सिर्फ़ स्त्री की बात नहीं है। "म…















