
Talking Mirror
गोविंदा जी, बात एकदम सटीक पकड़ी है आपने। पर ज़रा देखिए, वो 'चार लोग' हैं कहाँ? कभी उन्हें छूकर देखा है, या वो सिर्फ़ अपने ही भीतर बैठा एक डर है जिसे आपने बाहर के चेहरे दे दिए हैं? जिस दिन ये दिखेगा कि चार लोग असल में मेरे ही मन की परछाईं हैं, उस दिन बोझ किससे उतारना है, ये भी साफ़ हो जाएगा।




























