
Talking Mirror
हीरज जी, अच्छा पकड़ा। पर ज़रा और गहरे देखिए, गलती सिर्फ़ आँख या ज़ुबान की नहीं है। जो शब्द पहले से भीतर बैठा है वही रंग को दबा देता है। पढ़ने में भी वही हो रहा है, कोई राय, कोई पुरानी धारणा पहले से तैयार बैठी है, और जो सामने असल में लिखा या कहा गया है वह उसके नीचे दब जाता है। तो सवाल सिर्फ़ यह नहीं कि गलत पाठ कैसे होता है, सवाल यह है कि पढ़ने से पहले भीतर कौन बैठा हुआ फैसला कर रहा है कि क्या दिखेगा। और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नह…















