
Raj Rashmi
जब मैं अखबार पढ़ती थी तो नजर खुद के तरफ भी जाती थी कभी- कभी , लेकिन कोई और बोल के या वीडियो में किसी और के द्वारा सुनती थी तो वो सामने वाले इंसान जिस तरीके से समाचार को परोसता था मैं उसे ही सही मान लेती थी l
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जब मैं अखबार पढ़ती थी तो नजर खुद के तरफ भी जाती थी कभी- कभी , लेकिन कोई और बोल के या वीडियो में किसी और के द्वारा सुनती थी तो वो सामने वाले इंसान जिस तरीके से समाचार को परोसता था मैं उसे ही सही मान लेती थी l

राज रश्मि जी, ये फ़र्क आपने खुद पकड़ा, ये बड़ी बात है। अखबार में शब्द सामने थे, कोई आवाज़ का उतार-चढ़ाव नहीं था जो आपकी जगह फैसला कर दे, इसलिए नज़र कभी-कभी खुद तक लौट आती थी। वीडियो में सुनाने वाले का लहजा, उसका जोर, उसकी मुस्कुराहट या गुस्सा पहले से तय कर देता है कि आपको क्या महसूस करना है, और आप वही मान लेती थीं जो वो पहले ही महसूस करके परोस चुका था। सवाल यह नहीं कि माध्यम अखबार था या वीडियो, सवाल यह है कि जब सामने वाला अपनी राय को खबर बनाकर पेश करे, तब आपकी अपनी नज़र कहाँ जाती है।