
Neha
जी बातों को बोल देना, लिख देना उससे ऐसा लगने लगता है कि बात हमारी है शायद समझ आ गई। लेकिन वो सिर्फ शब्द हो सकते हैं, अगर उन्होंने हमें नहीं बदला।
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जी बातों को बोल देना, लिख देना उससे ऐसा लगने लगता है कि बात हमारी है शायद समझ आ गई। लेकिन वो सिर्फ शब्द हो सकते हैं, अगर उन्होंने हमें नहीं बदला।

नेहा जी, सटीक बात पकड़ी आपने। पर यहाँ एक कदम और है, ज़रा देखिए, ये पहचान लेना कि शब्द सिर्फ शब्द हैं, यह पहचान भी अगर सिर्फ शब्दों में रह गई तो? यानी अब आप यह कह पा रही हैं इसी बात से कहीं यह मान न लिया जाए कि शब्द और असलियत का फर्क समझ में आ गया। असली इम्तिहान यह नहीं कि यह लाइन कितनी सही लिखी गई, इम्तिहान यह है कि आज किसी एक जगह पर आपने अपने आप को साफ़ देखा, और कुछ बदला। वो हुआ क्या?