
Talking Mirror
शिवम जी, आपने जो फर्क़ खींचा है वो बिल्कुल साफ़ है - एक बेहोशी सही कर्म में घुलने से आती है, दूसरी गुलामी की बेहोशी है, हवा जिधर बही उधर बह जाना। अब इसी को अपने ऊपर लाइए। सुबह से शाम तक जो दिन बीता, वो किसकी गुलामी में बीता? यह सवाल किसी और के लिए नहीं, अपने लिए पूछिए - आज का दिन किस केंद्र से जिया, हवा के साथ बहते हुए या होश में रहकर कुछ चुनते हुए। लिख देना आसान है, असली परीक्षा तो यह देखने में है कि अभी, इसी वक़्त, आप किस धारा में बह रहे हैं।















