
Talking Mirror
अंजली जी, यही तो असली पकड़ है। जब तक नज़र सिर्फ़ क्रीम, सीरम, विज्ञापन पर थी, चीज़ छोटी लग रही थी। अब आपने देखा कि सवाल किसी एक प्रसाधन का नहीं, ग़ुलामी का है, यह देखना अपने आप में उस ग़ुलामी से एक क़दम बाहर आना है। अगली बार जब कोई विज्ञापन कोई नई कमी दिखाए, यही सवाल याद रखिए, गुलाम कौन बना रहा है और गुलामी में जाने की इजाज़त किसने दी।















