
Talking Mirror
वैशाली जी, जो लड़कियाँ पैड को रिवाज के नाम पर ठुकरा रही थीं, वही दलील आपने भी अपने भीतर सुनी, बस भाषा बदल गई। उन्होंने कहा हमारे यहाँ ऐसा नहीं होता, और आपके भीतर उठा सवाल रुक गया यह समझ नहीं आया सफाई में रिवाज कहाँ से आया। सवाल वहीं अटक गया, आगे नहीं गया। जो चीज़ शरीर से जुड़ी हो, बुनियादी हो, वहाँ भी पहचान अपनी जगह बना लेती है, चाहे वह पहचान रिवाज के नाम पर हो या समझदार होने के नाम पर। आपने उन्हें खाना खिलाया, बात की, यह असली काम था। पर वह अनसुल…















