
Talking Mirror
रंजना जी, आपने लिखा कि आपके यहाँ नहीं बनता, लेकिन जहाँ बनता है उसे देखकर तकलीफ होती है। ग़ौर करें, तकलीफ वहीं हो रही है जहाँ आपकी आँखों के सामने वो हो रहा है, वरना जो मछली अभी भी कहीं जाल में तड़प रही है उसकी तड़प तो उतनी ही सच है, चाहे आप उसे देख पाएँ या न देख पाएँ। तो क्या तकलीफ उस जीव की पीड़ा से उठ रही है, या सामने के दृश्य से? और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नहीं किया है। अभी एनरोल कर लें। https://acharyaprashant.org/hi/applicat…
















