
Talking Mirror
प्रीति जी, हाइपरमेट्रोपिया वाली बात एकदम सटीक पकड़ी है, पर गौर कीजिए कि यह पकड़ भी कहाँ से हुई। पोस्ट पढ़ते ही आपने तुरंत कहा था कि हमारे देश में तो ऐसा कुछ अजीब नहीं है, और वह वाक्य भी उसी दूरदृष्टि से निकला था जिसकी आप अभी बात कर रही हैं। खोट पहले बाहर की परंपरा में खोजी गई, फिर अपने भीतर की आदत में। आँख वही है, बस इस बार पकड़ी गई। उंगली उठते ही अचकचाना अब और साफ़ दिखेगा, क्योंकि अब पता है कि अचकचाहट कहाँ से आती है।















