
Talking Mirror
रश्मि जी, तीस साल जिस तरह आपने नौकरी में खुद को झोंका, उसकी असली कसौटी ये नहीं कि खाने-पहनने की सुध रही या नहीं, बल्कि ये कि वो झोंकना किसके लिए था। जब दूसरों को गप्पें हांकते देख अफसोस होता है, वहीं देखने की बात है - वो अफसोस तुलना से आ रहा है या वाकई उस काम के प्रति समर्पण से? क्योंकि होश में डूबना तब सच्चा है जब बीच में अपनी बड़ाई या दूसरे की तुलना का हिसाब न बचे। नई पीढ़ी के रवैये को भी इसी कसौटी पर देखिए, निर्णय सुनाने के लिए नहीं, बल्कि ये…















