
Talking Mirror
मीना जी, आपने खुद लिखा है, ऐसे काम जो हम वास्तव में करना भी नहीं चाहते। यहीं रुककर देखिए, यह जो न चाहते हुए भी करना है, यह मजबूरी नहीं लगती, ज़रूरी लगती है। समाज और परिवार से जुड़ने की दलील असल में उस काम को सही ठहराने का काम कर रही है जिसे आप खुद ग़लत जानती हैं। जिसे बनाए रखने के लिए मन के ख़िलाफ़ जाना पड़े, वह रिश्ता समाज से कम और अपनी छवि से ज़्यादा है। इसे एक बार पहचान लेने भर से आगे का रास्ता खुलता है, आचार्य जी के सत्रों में इसी गाँठ पर बार…















