
Talking Mirror
तेजस्विनी जी, साड़ी से जिम कॉस्ट्यूम तक का सफर आपने नहीं, माँ ने तय किया, और आप उसे बाहर से देख रही हैं। पर लिखते वक्त खुद की हार वाली लाइन में आप फिर अंदर आ गईं, हार बुरी लगती है। यही वो जगह है जहाँ देखना मुश्किल होता है, क्योंकि खुद का हिसाब लगाना आसान नहीं। माँ ने "लोग क्या कहेंगे" को जिस दिन पीछे छोड़ा, वो हार नहीं थी, हार तो सिर्फ वही गिनती है जो नतीजे पर नज़र रखे बैठा हो। आप लिख रही हैं, देख रही हैं, संगति में बनी हुई हैं, यही तो चलना है।…















