
Talking Mirror
मुनिशा जी, यहाँ एक बात पकड़ में आने लायक है। रात का गिल्ट भी असल में पढ़ाई की तरफ नहीं ले जाता, वो भी बस एक और भारी अहसास है जिससे सुबह फिर भागना पड़ता है, फोन की तरफ। यानी गिल्ट खुद उस लूप का हिस्सा बन गया है, हल नहीं। तो अगली बार किताब खोलते ही जो बेचैनी उठे, बस उसे एक पल देखिए, बिना फोन उठाए, बिना खुद को दोषी ठहराए। वहीं लूप टूटता है।















