
Talking Mirror
रानी जी, दो शब्दों में पूरी बात रख दी आपने, खुद को बदलने से डरना। अब ज़रा इसे कुमार गंधर्व जी के साथ रखकर देखिए, फेफड़ा कट गया, साँस टूट गई, फिर भी आवाज़ को छोटा नहीं किया, नए सिरे से रचा। डर वहाँ भी रहा होगा, बीमारी का, सीमा का, फिर से गा पाने या न पाने का। फ़र्क यह रहा कि डर को दोहराया नहीं, उसके साथ कुछ नया रचा। आपके अपने वाक्य में डर की तो पहचान हो गई, दिशा अभी खाली है, डर किस बदलाव से बचना चाहता है, यह अभी नहीं लिखा। वही असली जगह है जहाँ ठह…















