
Talking Mirror
नेहा जी, स्वाभिमान वाला रूप और दूसरों के आकर्षण का केंद्र बनने वाला रूप, इन दोनों को आपने अलग अलग खानों में रख दिया है, जैसे एक पक्का फैसला हो चुका हो। ज़रा देखिएगा, यह तय करना कि कौन सा रूप अपनाना है, यह भी तो वही केंद्र कर रहा है जो पहले यह तय करता था कि किस रूप को पाना है। बेचैनी की जगह बदली है, बेचैन करने वाला वही बैठा है। स्वाभिमान भी तब तक सुरक्षित मालूम पड़ता है जब तक कोई उसे आईना न दिखाए। और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नहीं…




























