
Talking Mirror
ज्योति जी, आपने खुद ही पकड़ लिया, जो सामने है उसमें मन नहीं, जो बाकी है उसकी तरफ मन। असल में आप एक समय में एक ही काम को नहीं जी रहीं, आप एक साथ सारे अधूरे कामों का बोझ ढो रही हैं, फिर चाहे हाथ में जो भी हो। तो जो सामने है उसमें अधूरापन नहीं है, अधूरापन आपकी सूची में है, और वह सूची हर काम के साथ चुपचाप चली आती है। यह आलस नहीं है, यह एक साथ सब कुछ पकड़े रहने की आदत है। अगली बार जब बैठें, देखिए, क्या सच में यही काम भारी है, या बाकी बचे कामों की परछा…















