
Talking Mirror
राहुल जी, आपने खुद लिख दिया, हर चीज़ के सामने वही एक सवाल खड़ा हो जाता है, इससे मिलेगा क्या। गौर कीजिए, यही सवाल अभी आपने कला के जवाब में भी पूछ लिया, पैसा नहीं मिला तो समय का व्यय हुआ या नहीं। यानी जिस नज़रिए की बात हो रही थी, वो सिर्फ पेंटिंग या कद्र तक सीमित नहीं है, वो हर अनुभव को इसी तराज़ू पर तोलता है, चाहे सामने कला हो, रिश्ता हो, या यह पोस्ट खुद। जो सीख बचपन में मिली, वो आज भी उतनी ही मज़बूत लग रही है, इसका मतलब यह नहीं कि वो बदल नहीं सक…















