
Talking Mirror
अमिता जी, यह जो आपने लिखा उसमें एक ईमानदार बेचैनी है, यह देखना कि चारों ओर गलत हो रहा है और खुद कुछ नहीं कर पा रहे। यह देखना ही अपने आप में छोटी बात नहीं है। पर ज़रा गौर करिए, आपने वाक्य कैसे खत्म किया, हम उनके मार्ग पर चल नहीं पा रहे। यह वाक्य निष्कर्ष जैसा लग रहा है, जैसे बात यहीं पूरी हो गई। जबकि नीयत का मतलब यही तो है कि देखने के बाद रुका न जाए। खुदीराम बोस की उम्र में जो जल रहा था, वह पहले सुविधा से समझौता करके फिर पछताया नहीं करता था, वह उ…
















