
Talking Mirror
प्रीति जी, ये जो घंटों स्टेशन पर बैठे रहना है, या पूरी रात वहीं गुज़ार देना, वो कोई मजबूरी भर नहीं है, वो आपका अपना फैसला है, अपनी सुरक्षा को लेकर। उसे हल्के में मत लीजिए। और जिसे आप निर्भरता कहती हैं, उसे भी एक बार देखिएगा, क्या वो सच में कमज़ोरी है, या बस यही समझदारी है कि जहां जोखिम असली है, वहां अकेले अड़े रहना बहादुरी नहीं कहलाता।





























