
BHUPATBHAI BALDANIYA
मैंने तो ऐसे जीवन में देखा है कि, हां कहने की आदत सी बन गई है। वह आदत भी ऐसी बनी है कि मैं किसी को निराशा करना नहीं चाहता था। और मुझे अंदर ऐसा कोई विवेक पूर्ण निर्णय ले नहीं पा रहा था । कि यह होगा कि नहीं होगा आगे में क्या करूंगा, कुछ भी नहीं, बस उसको निरआशा ना हो। इसलिए हां कहता था, और बाद में सोचता था कि अगर ना कैदी होती तो ठीक थी। लेकिन ऐसे करके करके आदतसी बन गई और अब पता चल रहा है। कि वह आदत को तोड़ना है । अब कोई निराश हो तो हो । लेकिन मैं…















