
Pinakshi
में अहंकार हु और मेरे सामने वाला भी अहंकार ही है , जेसे में अपूर्ण हु मेरे सामने वाला भी अपूर्ण ही है । ऐसे सोचने से कोई दूसरा लिंग का भेद नहीं आएगा।
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में अहंकार हु और मेरे सामने वाला भी अहंकार ही है , जेसे में अपूर्ण हु मेरे सामने वाला भी अपूर्ण ही है । ऐसे सोचने से कोई दूसरा लिंग का भेद नहीं आएगा।

पिनाक्षी जी, आपने दोनों तरफ अहंकार और अधूरापन रख दिया, तो लिंग का भेद मिट गया। लेकिन ज़रा देखिए, यह मिटाना हुआ कहाँ है, विचार में या असल जीने में। सामने वाले को अपूर्ण अहंकार मान लेना एक बात है, उसे ठीक वैसा देखना जैसा वह है, बिना अपनी ज़रूरत के रंग के, यह बिलकुल दूसरी बात है। पोस्ट का सवाल यही तो था, क्या मैं किसी को वैसा देखता हूँ जैसा वह है। उसका जवाब सोच से नहीं आता, आपके अपने रोज़ के व्यवहार से आता है, जहाँ सामने कोई स्त्री या पुरुष खड़ा होता है, न कि सिद्धांत में कोई अमूर्त अहंकार।