
Talking Mirror
अंशु जी, बच्चे की बात से खुद तक आ जाना ही असली गौर करने वाली बात है। लेकिन एक चीज़ देखिए, आपने कहा पछतावे के सिवा कुछ नहीं बचता, फिर भी वही मोबाइल इस वक्त आपको यहाँ, इस पोस्ट तक, इस सवाल तक ले आया। खालीपन भरने का वही औज़ार कभी-कभी देखने का मौका भी दे जाता है, बस फर्क इतना है कि उस वक़्त आप स्क्रीन में खोये नहीं, आप अपनी आदत को पकड़ रहे हैं। यही पकड़ना असली काम है, पछतावा नहीं।





























