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Pallavi Aglawe
यह पढकर दिमाग सोचने के लिये मजबूर हो गया, मानो जैसे आज दिमाग की प्रक्रिया जान गयी हू तो बुरा लग रहा मानो जैसे हम जिसे दुख कहते है वो तो एक दिमाग की प्रक्रिया थी खुद को फिर से सहि करणे की , काम करणे की, संतुलीत करणे की, और हम ऐसे ही जिंदगी खराब करते है यह सोच कर की हम दुखी है ,यह सोचने मे की, हमेने हमारी प्यारी चीज खो दी है जबकि अगर हम वही समय अगर किसी सार्थक काम के लिये लगाये तो शायद जिंदगी बदल जाए या पहले जैसि ना रहे पर हम इसी चक्कर मे फसे रहते…















