
MaNorama Vyas
पहले मेरा ‘हाँ’ डर से निकलता था—कहीं कोई बुरा न मान जाए। आचार्य जी को सुनकर समझ आया कि सत्य के साथ जीना, सबको खुश करने से अधिक ज़रूरी है। अब जहाँ होता है, वहाँ हाँ; जहाँ नहीं होता, वहाँ साफ़ नहीं। लोग कहते हैं, “आप बदल गई हैं।” मैं कहती हूँ—बदली नहीं हूँ, बस अब डर नहीं, सत्य मेरा आधार है।















